क्यों पहले “राधे” फिर “कृष्ण” कहा जाता है : (Radha Premi Official)
जब भी कोई भक्त प्रेम भाव से
“राधे राधे” कहता है,
तो उसके पीछे केवल एक परंपरा नहीं,
बल्कि एक गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा होता है।
अक्सर लोग पूछते हैं — “पहले राधे क्यों, कृष्ण क्यों नहीं?” क्या इसका कोई शास्त्रीय या भक्ति कारण है?
इस प्रश्न का उत्तर हमें प्रेम, समर्पण और भक्ति के सबसे ऊँचे स्तर तक ले जाता है।
राधा जी कौन हैं?
राधा जी को केवल श्रीकृष्ण की प्रेयसी समझना अपूर्ण समझ है।
राधा जी स्वयं ह्लादिनी शक्ति हैं — यानी वह शक्ति जिससे भगवान को भी आनंद प्राप्त होता है।
जहाँ कृष्ण भगवान हैं, वहीं राधा जी भक्ति का स्वरूप हैं।
कृष्ण भी राधा के अधीन
संतों और रसिक महात्माओं का कहना है कि श्रीकृष्ण भी राधा जी के प्रेम के अधीन हैं।
कृष्ण स्वयं कहते हैं — “मुझे कोई वश में नहीं कर सकता, लेकिन राधा का प्रेम मुझे बाँध लेता है।”
इसीलिए जो भक्त कृष्ण तक पहुँचना चाहता है, वह पहले राधा की शरण लेता है।
पहले राधे कहने का भाव
जब भक्त पहले “राधे” कहता है, तो वह यह स्वीकार करता है कि —
“हे राधा जी, मुझे सीधे भगवान तक पहुँचने की पात्रता नहीं, पहले आप मुझे स्वीकार करें।”
राधा जी करुणामयी हैं। वह किसी योग्यता को नहीं देखतीं, सिर्फ प्रेम देखती हैं।
एक भक्त का अनुभव
एक भक्त का कहना है कि वह वर्षों तक “कृष्ण-कृष्ण” जपता रहा, लेकिन मन स्थिर नहीं होता था।
फिर किसी संत ने उससे कहा — “कृष्ण तक पहुँचना है, तो राधा के द्वार से जाओ।”
उस दिन से उसने “राधे राधे” कहना शुरू किया।
कुछ ही समय में उसने अनुभव किया कि मन में कोमलता, आँखों में आँसू और हृदय में शांति आने लगी।
राधा नाम में क्या विशेष है?
राधा नाम में न माँग है, न अपेक्षा।
यह नाम सिखाता है कि ईश्वर को पाने के लिए ज्ञान नहीं, बल्कि प्रेम चाहिए।
जब प्रेम जागता है, तब स्वयं कृष्ण भक्त के हृदय में प्रकट हो जाते हैं।
इसलिए पहले राधे, फिर कृष्ण
पहले राधे कहना अहंकार का त्याग है।
और फिर कृष्ण कहना भगवान की कृपा का फल।
जो भक्त इस भाव को समझ लेता है, उसकी भक्ति दिखावे की नहीं, अनुभूति की बन जाती है।
अंतिम भाव
“राधे कृष्ण” कोई शब्दों का क्रम नहीं, यह भक्ति का मार्ग है।
जो पहले राधा को पुकारता है, उसके लिए कृष्ण स्वयं रास्ता बन जाते हैं।
इसलिए संत कहते हैं — पहले राधे, फिर कृष्ण।
🙏 राधे राधे 🙏
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लेखक: Radha Premi Official
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